१६ मार्च के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैय्याजी
जोशी ने एक वार्ताकार परिषद में संघ की आने वाले समय की योजनाओं के बारे में कुछ
बातें बताईं. यह वार्ताकार परिषद इस वर्ष की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के स्थगन
के निर्णय के बाद हुई. संघ के इतिहास में १९५१-५२ से प्रारंभ हुए प्रतिनिधि सभा के
वार्षिक सम्मलेन का स्थगित होना पहली बार हुआ. इस बीच आपातकाल में जब संघ बंदी थी
तो उस समय यह सम्मलेन नहीं हो पाए थे. जहाँ एक ओर देश नागरिकता कानून के विरुद्ध
एक झूठ के साये में खड़ा किया गया आन्दोलन झेल रहा है, दूसरी ओर विश्व और हम सब करोना
वायरस के प्रकोप के डर में दुबके बैठे हैं, संघ के नेतृत्व ने सभी स्वयंसेवकों को
आग्रह किया कि वे समाज में इसकी रोक थाम के लिए आगे बढें, और साथ ही संघ के अब तक
की सबसे महत्वकांक्षी सकारात्मक योजना को सबके सामने रखा. सन्देश यह था कि
परिस्थिति कोई भी हो, कार्य रुकना नहीं चाहिए.
भैय्याजी जोशी ने जिस प्रकार संघ के भविष्य की विकास यात्रा का नक्षा
रखा, इससे लग रहा है, कि संघ अपनी विकास यात्रा के अगले चक्र में प्रवेश करने की
तैय्यारी में है. यह आगामी विकास पथ पिछले कुछ महीनों से चल रहे स्वयंसेवकों के
सर्वेक्षण पर आधारित है.
संघ के ९५ वर्ष के जीवन में ऐसे कई मील के पत्थर आये जिन्होंने संघ के
विकास को एक नयी दिशा दी और नए आयाम दिए. आपातकाल के समय प्रजातंत्र की लडाई और
उससे समाप्त हुई राजनैतिक अस्पृश्यता, १९८३ की एकात्मता यात्रा जो कि अब्राहमिक
पंथों के आक्रामक मत परिवर्तन के प्रयत्नों से हिन्दू समाज को बचाने के लिए निकली
गयी, जिसमे ८-१० करोड़ हिन्दू सम्मिलित हुए और संघ समाज के हर वर्ग और क्षेत्र तक
पहुंचा. संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार की जन्म शताब्दी ने सेवा कार्य को संघ कार्य के
साथ सीधा जोड़ा और स्वयंसेवकों को इसे मुख्य कार्य का हिस्सा होने का सन्देश देते हुए,
शाखा से भी जोड़ा. राम मंदिर आन्दोलन जन-जन तक पहुंचा और संघ को सीधे समाज से जोड़ते
हुए इस संगठन को एक जन-आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया.
इसके अतिरिक्त पिछले ७० वर्षों में संघ के विकास को लेकर कई
महत्वपूर्ण उद्विकास हुए. या महान संघ प्रचारक और विचारक दत्तोपंत ठेंगडी की भाषा
में कहें तो यह ‘Gradual Unfoldment’ का भाग थे. इस क्रमशः विकास में कई संघ
प्रेरित संगठन खड़े हुए – अखिल भारतीय परिषद् से वनवासी कल्याण आश्रम तक, भारतीय
मजदूर संघ से विश्व हिन्दू परिषद् से लेकर एकल विद्यालय तक; हर छोटा-बड़ा कदम समाज
के भीतर तक और समाज के हर क्षेत्र में संघ के विचार पहुँचाने का प्रयास रहा. उस
विचार को लेकर जिसके बीज डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने १९२५ में बोये थे.
कल जो कुछ पत्रकार सम्मलेन में देखा और समझा उससे ध्यान में आया की
समाज परिवर्तन के उद्धेश्य को लेकर संघ बिलकुल नया तरीका अपनाने वाला है. यह वैसा
मंथर गति का बदलाव नहीं है, जो अब तक संघ कर रहा था, अपितु इस बार प्रयत्न
परिवर्तन की गति को नया जोर लगाकर बड़ी छलांग लगाने का है.
पाठकों को स्मरण करा दूं कि पिछले वर्ष संघ और उससे प्रेरित संगठन –
राष्ट्र सेविका समिति और स्त्री शक्ति ने भारतीय महिलाओं का एक अद्वितीय विशाल
सर्वेक्षण किया था जिसमें लगभग ४३००० महिलाओं ने भारत भर के हर भाग और हर स्तर से अपने जीवन के बारे में कई
प्रश्नों के उत्तर दिए, जिससे महिलाओं के प्रश्न और उनकी आकांक्षाएं समझने काफी
स्पष्टता आई. इस सर्वेक्षण की रपट का स्वयं सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने लोकार्पण
किया, साथ ही इस की रपट केन्द्रीय सरकार तक भी पहुंचाई गयी. अपने विचार प्रकट करते
हुए मोहन जी ने स्पष्ट किया कि इस सर्वे के आधार पर महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक
स्तर सुधारने के लिए योजनायें बनाने के लिए उपयोग किया जायेगा. उन्होंने यह भी आशा
प्रकट की कि सरकार भी अपनी नीतियां बनाने में इसका उचित उपयोग करेगी. यह मूलतः एक नयी पहल थी जिसमे निर्णय व्यक्तिगत
अनुभवों के आधार पर कुछ लोग नहीं करेंगे, बल्कि घने आंकड़ों के आधार पर योजनाएँ
बनेंगी.
अब इसी दिशा में संघ के स्वयंसेवकों के सर्वेक्षण को भी देखना चाहिए,
जो सोलह लाख तरुण और प्रौढ़ तरुणों ने इन्टरनेट का उपयोग करते हुए और व्यक्तिगत
भेंट द्वारा भरे. पहली बार इतने व्यापक स्तर पर कोई ऐसा सर्वेक्षण हुआ होगा, जिसमे
उत्तर देने वाले स्वयंसेवक की वय, पढ़ाई, व्यवसाय और रूचि की जानकारी ले गयी. इसके
पीछे यह सोच रही कि स्वयं कार्यकर्ता बताये कि अपनी योग्यता और रूचि के अनुसार
कौनसा सामजिक कार्य वह कर सकता है. इसी जानकारी पर निर्धारित रह कर इस स्वयंसेवी
शक्ति को उसकी रुचि के अनुसार जिम्मेदारी दि जायेगी. उनके फिर १८ से २५ और २६ से
३५ वर्ष के दो गट बनाए जायेंगे. इससे अधिक उम्र के लोग भी इसमें हिस्सा ले सकेंगे.
एक बड़ा विषय है ग्राम विकास जिसमे पांच विधाएं हैं – शिक्षण, स्वस्थ्य, खेती-बाड़ी,
सामाजिक समरसता और आत्म निर्भरता. हजार गाँव निर्वाचित कर लिए गए हैं, जिनमे से
३०० में काम वर्तमान में चल भी रहा है.
अन्य क्षेत्र जिनमे शक्ति लगाई जायेगी, वे हैं, प्राकृतिक सम्पदा का
संम्वर्धन, जल-संवर्धन और उपयोग, प्लास्टिक का उपयोग कम करना इत्यादि. इन कामों के
लिए तरुणों को प्रशिक्षण दिया जायेगा.
केवल भौतिक विषय नहीं, बल्कि एक और सांस्कृतिक विषय भी संघ के ध्यान
में है. वह है भारत की परिवार या कुटुंब
व्यवस्था को सींचना और जहां कमजोर पड़ गयी है, वहां पुनर्जीवित करना. परिवार संघ की
सोच में अति आवश्यक इकाई है जिसने इस देश की परम्पराओं और संस्कृति को बचा कर रखा
है. इस देश की भावात्मक एकता और यहाँ की संस्कृति को अब तक जीवित रखने में परिवार
का बहुत बड़ा योगदान है. भैय्याजी जोशी ने एक और बड़ी व्याख्या की, कि संघ संयुक्त
परिवार की बात नहीं कर रहा. क्योंकि शहरी जीवन के दबाव में यह संभव नहीं. परन्तु
हम भावनात्मक रूप से परिवार को जोड़ कर रख सकते हैं, इकट्ठे मिलकर, इकट्ठे कभी न कभी खाना खाकर, पूजा
करके, उत्सव मनाते हुए. इस परिवार भाव को जगाने के कार्य को ‘कुटुंब प्रबोधन’ का
नाम दिया है. यह प्रयत्न कुछ वर्ष पहले शुरू हुआ था. अब परिस्थिति की गंभीरता को
देखते हुए, इस काम पर जोर लगाने के लिए एक लाख तरुणों को प्रशिक्षण दिया जाएगा. यदि
हम गौर करें तो इन समाज परिवर्तन की कोई भी योजना किसी पंथ या मत से नहीं जुडी है.
इसका मतलब है कि समाज का हर सदस्य इसमें शामिल हो सकता है और इन कार्यक्रमों की
गति और बढ़ा सकता है.
संघ लगातार बढ़ रहा है, अब यह कोई समाचार नहीं रह गया. इस वर्ष की रपट
भी बताती है कि यह विस्तार स्थिर गति से बढ़ रहा है. इस वर्ष दैनंदिन शाखाओं की
संख्या ३००० से बढ़ कर ६३००० तक पहुंची है, जबकि साप्ताहिक और मासिक मिलन बढ़ कर २८०००
तक पहुँच गए हैं. इस प्रकार संघ कार्य किसी ने किसी रूप में ७०००० हजार स्थानों
में गाँव और शहरों में पहुंचा हुआ है. इस कार्य की गति तो और बढ़ेगी जब हम देखते
हैं कि इस वर्ष भी १५००० स्वयंसेवकों ने संघ के संघ शिक्षा वर्गों में प्रशिक्षण
लिया है. इसके अलावा लगभग एक लाख ने एक सप्ताह के प्राथमिक वर्गों में भाग लिया
है. इतना ही नहीं, तो भैय्या जी जोशी ने यह स्पष्ट किया कि संघ का औपचारिक
प्रशिक्षण आवश्यक नहीं, बल्कि अनौपचारिक प्रशिक्षण भी नए कार्यकर्ताओं को दिया
जायेगा. यह अनौपचारिक प्रशिक्षण पहले ही आरम्भ हो चुका है. हम यह अंदाज लगायें कि
संघ को व्यक्ति से व्यक्ति जोड़ते हुए, यहाँ तक आने में ९५ वर्षों की तपस्या करनी
पड़ी है. क्योंकि यह काम व्यक्ति से व्यक्ति जोड़ने से ही होता है, प्रचार-प्रसिद्धि
या भाषणों से नहीं.
इस ९५ साल के धनसंचय को अब संघ निवेशित करना चाहता है. इस निवेश से सामाजिक
व्यवहार, पारिवारिक संस्था का सिंचन, समग्र ग्राम विकास और प्रकृति, विशेष रूप से
जल संवर्धन, आर्थिक स्वावलंबन के साथ आत्म सम्मान का जीवन, ऐसे कई विषय शामिल हैं.
मैं इन घोषणाओं में इन विषयों को देखने और आगे बढाने के तरीके में बड़ा
परिवर्तन देख रहा हूँ. अब योजनों को लागू करने में एक जल्दी करने का मानस है. इस
संगठन की विशाल संग्रहित शक्ति को इस राष्ट्र की सेवा में लगा कर राष्ट्र जीवन के
अलग-अलग आयामों के विकास में बहुत बड़ी छलांग लगाने का मानस संघ ने बना लिया है. अब
तक संघ सामाजिक परिवर्तन से सम्बंधित विषयों को श्रद्धा और आग्रह से, लेकिन मंथर
गति से कर रहा था, और केंद्रबिंदु संघ शाखाओं की वृद्धि और उनके द्वारा व्यक्ति
निर्माण ही रहा. अब अनौपचारिक प्रशिक्षण और सीधे सामाज सेवा के अनुभव से भी सामाजिक
परिवर्तन से व्यक्ति में परिवर्तन और उसका
व्यक्तित्व निर्माण हो सकता है, शायद ऐसा विचार बना है.
अब तक संघ ने पिछले वर्षों में अपने स्वयंसेवक और समाज के लिए जो भी
ठाना है, वह न्यूनाधिक सफलतापूर्वक पूरा किया है. इसलिए यह पूर्ण रूपेण संभव है,
कि इस वर्ष में रेखांकित महत योजना भी आने वाले ४-५ वर्षों में पूरी हो और संघ
अपने १०० वर्ष पूरे होने को इसी प्रकार मनाये. अंततोगत्वा संघ एक ऐसा संगठन है, जो
समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक काम करते हुए भारत को परम वैभवशाली राष्ट्र
बनाना चाहता है. यदि संघ अपने स्वयंसेवकों और शुभचिंतकों के इतने बड़े आधार के
आत्मविश्वास और दृढ निश्चय से सफल हुआ तो भारत में हम एक अकल्पनीय साकार परिवर्तन देख
पाएंगे.
यह लेख पांचजन्य साप्ताहिक में पहले छपा था.
Ratan Sharda
18th March,
2020.
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