Saturday, March 28, 2020

समान नागरिक कानून – भारतीय संविधान का वादा



भारतीय न्यायलय कई वर्षों से विभिन्न भारतीय प्रशासनों को समान नागरिक धारा लागू करने के लिए स्मरण दिला रहे हैं. भारतीय संविधान की धारा ४४ के अंतर्गत समान नागरिक कानून लागू करना राष्ट्र के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के अंतर्गत आता है. यह विषय १९८५, १९९५ और फिर २०१५ में उठा. इस समय तीन तलाक पर निर्णय देते हुए फिर सर्वोच्च नयायालय ने फिर सरकार को इसका स्मरण दिलाया. न तो तीन तलाक पंथ के का विषय है, यह महिलाओं के लिए सामान अधिकार की बात है.
कई लोगों को यह बात समझ नहीं आती कि पंडित जवाहरलाल नेहरु सामान नागरिक संहिता का क़ानून को क्यों लागू करवा सके जबकि उनके पास १९५० के काल में जनता का  अत्यधिक प्रभावी साथ था. सामान संहिता की जगह केवल हिन्दू कॉड बिल क्यों लाया गया. इसी ठिठक जाने के कारण सामान नागरिक संहिता को डायरेक्टिव सिद्धांतों में शामिल करना पडा. जिसमे कहा गया कि, "राज्य भारत में रहने वाले सभी नगरिकों के लिए सामान कानून लाने की व्यवस्था करेगा.” (The State shall endeavour to secure for citizens a uniform civil code throughout the territory of India." उस समय इस व्यवस्था को लागू न कर पाना एक बड़ी भूल थी जो एक उदारवादी प्रजातांत्रिक समाज के विचार को बल देता. एक सुनहरा मौका राष्ट्र के हाथ से निकल गया.
तथाकथित अल्पसंख्यकों के और उनके तथाकथिक शुभचिंतक इस धारा को लागू करना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटिल व्यूह होने का दवा करते हैं. वह इस तथ्य से आँखें मूँद लेते हैं कि भारत की संविधान सभा में एक भी सदस्य संघ का नहीं था. जिन न्यायालयों ने शरिया के लागू करने की मांग और सामान नागरिक कानून के बारे में निर्णय दिए थे, वे कोई भी संघ के प्रभाव में नहीं थे. इस विषय को संघ और हिंदुत्व का रंग देकर बहस को भटकने से हम बचें, ऐसा मुझे लगता है.
सर्वसाधारण मान्यता के विपरीत, सच यह है कि संघ पहले सामान नागरिक कानून या हिन्दू कोड बिल को जबरदस्ती लागू करने के पक्ष में नहीं था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी ने अगस्त १९७२ को क र मलकानी जी को एक साक्षात्कार में खा था, “यदि हमारा मुस्लिम प्रथाओं के प्रति विरोध मानवीय कारणों से है, तो वह तर्क सांगत है. समाज सुधार के आधार पर यह सही है. परन्तु केवल सभी को एक ही मापदंड पर लाने की बात है तो यह सही नहीं होगा. मुसलमान अपनी पुरानी प्रथाओं से बाहर विकसित होने का  स्वयं मार्ग निकलें. अर्थात सामान नागरिक संहिता संघ के लिए एक पसंदीदा विषय होगा, परन्तु यह सुधार की इच्छा विभिन्न समाज के वर्गों से आना उचित होगा.
जाने माने मुसलमान विद्वानों के आधार पर मैं यह विश्वास से कह सकता हूँ कि शरिया ईश्वर द्वारा प्रेषित कानून नहीं है. शरिया और हदीस पैगम्बर की मृत्यु के २-३ दशकों के बाद खलीफा के काल में लिखने शुरू हुए, और यह लगभग १०० साल तक लिखते जाते रहे. इनमे से अधिकतम कानून  कुरान से नहीं बल्कि बल्कि अरबी समाज व्यवस्था से उठाये गए. न ही यह कानून सभी मुस्लिम देशों में एक समान हैं. स्थानीय देश, काल और परिस्थिति के अनुसार इसे लागू किया गया है. कई मुस्लिम राष्ट्रों ने तो शरिया के कई कानून निरस्त कर दिए हैं, जैसे तीन तलाक.
जिस प्रकार से मुस्लिम महिलाएं शरिया के नाम पर उसके दुरुपयोग के विरुद्ध बड़ी संख्या में दृढ होकर बाहर निकली हैं इससे स्पष्ट है की यह सुधारवादी विचार अब और रोकना मुश्किल हैं. रूढ़िवादी मौलवियों का अड़ियलपना और धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरे की बातें करना केवल उनकी पुरुष प्रधान सोच का परिणाम है जो कि १४०० साल पुराने अरबी संस्कृति को उजागर करता है, जिसे वे विभिन्न संस्थाओं को जिनकी कोई मान्याता समाज में नहीं है. इससे लगता है, की कानून के द्वारा सामान नागरिक संहिता लाने के अलावा अब कोई मार्ग नहीं है.  
ऐसे कुछ कानून ईसाई समाज के लिए भी समस्या हैं, जिनके अंतर्गत तलाक लेना और बच्चा गोद लेना आसान नहीं. एक टीवी की बहस के दौरान एक पादरी ने कहा ईसाईयों के अपने क़ानून हैं, परन्तु वे स्पष्ट हैं कि जिस राष्ट्र में वह रहते हैं, उनको मानना उनका कर्त्यव्य है. उनको सामान नागरिक अधिकारों से कोई समस्या नहीं है. परन्तु उन्होंने सही प्रश्न खा किया कि वे कानून क्या हैं, यह तो सरकार बताये. अतः अब समय आया है, कि प्रशासन इस कानून की  एक कच्ची प्रति समाज को दे जिस पर व्यापक बहस हो पाए.
ऐसा कोई कारण नहीं कि हिन्दू संहिता को सभी पर सामान नागरिक संहिता के नाम परा लादा जाये, क्योंकि उसमे भी कुछ कमियां हो सकती हैं. यदि सामान अधिकार के अंतर्गत हिन्दुओं को कुछ हिन्दू संयुक्त परिवार जैसे कानून के लाभ त्यागने पड़ें, या वह लाभ अन्य समाज को भी मिलें तो अच्छा ही है. यदि ऐसी कानून से महिलाओं को संपत्ति पर सामान अधिकार मिलें तो यह भी उत्तम है. यदि इसका अर्थ है कि सभी महिलाओं को तलाक के सामान अधिकार मिलेंगे तो भी उत्तम. यदि इससे बच्चे गोद लेना आसान हो तो यह मानवता के लिए और समाज की भलाई के लिए एक उचित सेवा होगी.
आसान शब्दों में कहा जाए तो सामान नागरिक अधिकार secularism, जिसे हम भारतीय सन्दर्भ में सर्व पंथ समभाव कहते हैं, की परिभाषा में ही समाहित है. पाश्चात्य विचारों से परिभाषित करें तो secularism राज्य व्यवस्था और पंथ व्यवस्था को अलग अलग रखता है. यदि हम भारतीय मूल्यों से देखें तो सभी पंथों को सामान आदर भाव से देखना भारतीय सोच में ही समाहित है. परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम ‘धर्म’ का त्याग कर दें. हमारी परिभाषा में धर्म और पंथ में अंतर है. धर्म ऐसी व्यवस्था है को समाज को जोड कर रखता है, उसे नागरिकों के कर्तव्यों और न्यायप्रद व्यवहार से अच्छी प्रकार चलने का मार्ग प्रशस्त करता है.
कानून सभी नागरिकों के लिए समान होने चाहिए चाहे वे किसी भी पंथ, जाति या लिंग के हों. एक secular प्रजातांत्रिक राष्ट्र में किसी भी पंथ के कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकते. यदि हम समान अपराधिक कानून स्वीकार कर सकते हैं, तो हमें समान नागरिक अधिकार स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए. यह किसी भी नागरिक के पंथ या सम्प्रदाय के अधिकारों का हनन नहीं करता.
कई प्रकार के कानूनों के भूल भुलैयाओं के जाल के कारण लोगों को न्याय मिल पाना कठिन और बहुत कष्टप्रद हो गया है. यह अत्यन आवश्यक है कि आम लोगों के लिए नागरिक कानून आसान किये जाएँ ताकि न्याय प्राप्त करना गति से और आसानी से हो. आपराधिक कानून भी इसी तरह आसान करने होंगे. ऐसी कानूनों का क्या लाभ जिनके कारण किसी गरीब शाहबानो को तीन दशक लग जाएँ, या किसी निरपराध को जेल से बाहर आने में १०-२० साल लग जाएँ. ऐसे कानून का क्या लाभ जीने समझने के लिए किसी गरीब व्यक्ति को महंगे महंगे वकील लेने पड़ें और किसी इतने सालों तक चलें कि व्यक्ति की कमर टूट जाए और वह मन की शक्ति जवाब दे दे ?
हमें सामान नागरिक संहिता के लिए विचार विमर्श करना चाहिए जो पंथिक उन्माद की भाषा से परे हो और वैश्विक स्तर  पर मान्य मापदंड पर खरी उतारे कि न्याय के द्वार पर हम सभी समान हैं.

This article was written for a newsportal. 
५-१०-२०१९




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